कर के मजदूरी बचपन निकलता रहा

कर के मजदूरी बचपन निकलता रहा
खेलने के लिए वो तरसता रहा

चाहिए थी कलम पर मिली चाकरी
बोझ बचपन उठा के सिसकता रहा

रूप वैसे तो बच्चा है भगवान का
पर गरीबी में भूखा तड़पता रहा

धन गरीबों को कागज़ पे मिलता बहुत
पर तिजोरी में नेता की भरता रहा

बाल अपराध भी इतने अब बढ़ गए
‘अर्चना’ देख दिल बस दहलता रहा

डॉ अर्चना गुप्ता

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