बने व्याधि के पूत, हाँफते पीकर गाँजा

गाँजा-चरस-अफीमची,बन सिकुड़ी है खाल|
जब-बंधन की खाट पर, ठोक रहे भ्रम-ताल||
ठोक रहे भ्रम-ताल, काल के आगे हँसकर|
सोख रहे निज रक्त, दंभ की मग में बस कर||
कह “नायक” कविराय, बज गया इनका बाजा|
बने व्याधि के पूत, हाँफते पीकर गाँजा||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 1 Comment 0
Views 113

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share