बने व्याधि के पूत, हाँफते पीकर गाँजा

गाँजा-चरस-अफीमची,बन सिकुड़ी है खाल|
जब-बंधन की खाट पर, ठोक रहे भ्रम-ताल||
ठोक रहे भ्रम-ताल, काल के आगे हँसकर|
सोख रहे निज रक्त, दंभ की मग में बस कर||
कह “नायक” कविराय, बज गया इनका बाजा|
बने व्याधि के पूत, हाँफते पीकर गाँजा||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

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