कविता · Reading time: 2 minutes

बदले खण्डित इतिहास-भूगोल !

मारें ऐसे दांव पसार-डूबे बर्बर जिहादी संसार !
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विषमय मुखों को तोल-तोल ,
प्रचण्ड शौर्य हुंकारें खोल ;
जहां जिहादें चढ़कर बोले ,
विघटन -विभेद की भाषा बोले !
त्वरित नयन, विस्तीर्ण कर खोल ;
खूब काट मचा , कर डांवा-डोल !
जिनमें खून पीने की सनक सवार हो
काफिर कहकर उठती तलवार हो ,
जहां जीवों की उठती चीत्कारें,
इसपर सोचें-मंथें विचारें !
जहां सनक हो लूट खसोट की,
देश की संस्कृतियों पर चोट की ;
उस सनक को धोवो खूब ;
बर्बर जिहादी जावे डूब !
आतंकों के क्रूर प्रहार हो ,
जामातियों में सनक सवार हो ;
उस सनक को कर दें ध्वस्त ;
शुद्धता का मार्ग करें प्रशस्त !
जहां जिहादी नारे देखें ,
मानवता के हत्यारे देखें ,
कायरता के कलूषित धंधे हों,
अस्पतालों में ऐसे नंगे हों ,
गंदगी सूत्र लिए आधारों में ,
टट्टी करते बाजारों में ,
पुलिस-डाक्टर पर थूकते देखें ,
चांटों के बरसातें भींचे !
जहां गलियों में देखें थूक ;
नहीं कहीं जावें चूक !
निर्णय लेवें यह देख सुन ,
मारें सालों को चुन-चुन !
आतंकों के हर अड्डों में ,
व्याभिचार के खड्डों में ,
विषैले वायरस मकोड़ों को ,
इन मल-मूत्र के कीड़ों को
मारें ऐसे दांव पसार ,
सिसके बर्बर जिहादी संसार !
जो देश जलाने वाले हों ,
क्रूर असभ्य मतवाले हों ,
इसको ऐसे मारो खूब ,
जिहादों से अस्स्लाम जावे ऊब !
जहां देश विरोधी बातें देखें ,
प्रतिपल घातक संघाते देखें ,
मारें ऐसे उलट पसार ;
घीस जावे म्लेच्छों का विस्तार !
भोजन में विष मिलाते देखें ,
जल में मैले-विष फैलाते देखें ,
दवावों में गहरी रस रसाते देखें ,
फल-सब्जियों में थूक-चाट , चटाते देखें !
इन जाहिलों को दें दुत्कार ;
करें अब अवश्य स्थायी उपचार !
पहचानें गहरे घावों को ;
प्रतिक्षण विषैले भावों को ;
तिक्ष्ण दृष्टि आंखें पसार ,
चौपट करें इन सबका व्यापार !
लेखनी कहती है खोल-खोल ,
प्रचण्ड शौर्य हुंकारें खोल ;
जिहादी जावे डोल-डोल ,
बदले खण्डित इतिहास-भूगोल !

अखण्ड भारत अमर रहे !

✍🏻 आलोक पाण्डेय

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