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बदलाव - एक प्रेरणादायक लघुकथा

एक समय की बात है, एक शहर में एक मशहूर मूर्तिकार रहा करता था। उसके मूर्ति का पूरे इलाके के साथ-साथ पूरे देश भर में चर्चा होती थी, क्योंकि वो जो मूर्ति बनाते थे वह मिट्टी के होते हुए भी सजीव प्रतीत होता था। उस मूर्तिकार की मूर्तियां जो भी देखता वह एक पल तक उसे देखते ही रह जाता। एक दिन वह एक मूर्ति बनाया जो बेहद सुंदर ,मनमोहक और आकर्षक था, उसे लगा वह मूर्ति उसके जीवन के सबसे खूबसूरत और बेहतर मूर्ति है जो उसके जीवन काल में आज तक नही बना होगा। वह मन ही मन ऐसा सोच रहा था पर वह सोचने लगा कि हो सकता है कि इसमें कुछ कमियाँ भी हो सकती है, इसलिए दूसरे मूर्तिकारों और लोगों का राय लेना वह जरूरी समझा और वह उस मूर्ति को शहर के चौराहे पर रख दिया और एक कागज में मूर्ति के सामने लिख दिया कि जहाँ पर किसी को इस मूर्ति में कुछ कमियां नज़र आये वह उस जगह पे निशान लगा दे।
उसके बाद वह मूर्तिकार मूर्ति को छोड़ कर घर चला गया फिर क्या देखते ही देखते पूरे मूर्ति पर हजारों निशान लग गया। जब मूर्तिकार शाम को वापिस आया तो देखा कि निशान से पूरा मूर्ति ख़राब हो चुका है। अपने जीवन का सबसे बेहतरीन कार्य और सबसे आकर्षक मूर्ति का ऐसा हालत देख कर वह बेहद दुखी हुआ। जिस मूर्ति में उसे एक भी कमियाँ नही दिखे थे उसे इतनी कमियाँ निकाल दी कि वह उसे गिन भी नही पाते। अब उसे कुछ समझ ही नही आ रहा था,की वह क्या करें? दुखी मन से वह उस मूर्ति को उठाकर घर की तरफ़ चल दिया।रास्ते में उसे उसके प्रिय मित्र मिला मित्र काफी समझदार था उसने दुखी होने का कारण अपने मूर्तिकार मित्र से पूछा आखिर दुःखी क्यों हो?
तो मूर्तिकार ने पूरी घटना अपने मित्र को बताया। उसके मित्र ने कहा मित्र दुःखी होने की कोई आवश्यकता नही है तुम एक काम करो कल ऐसी ही एक दूसरी मूर्ति बनाव और उस पर फिर एक कागज में लिखना *जिस किसी को इस मूर्ति में जहाँ कोई भी कोई कमियाँ नजर आए कृप्या उसे सही कर दे*। मूर्तिकार ने अपने मित्र के कहे अनुसार अगले दिन वैसा ही किया। शाम को जब उसने अपनी मूर्ति देखी तो उसने देखा कि मूर्ति में किसी ने कुछ भी नही किया है, मूर्तिकार ने संसार की रीति समझ गया।
*कमी निकलना,बुराई करना, निंदा करना, दोष देना आसान होता है लेकिन उस कमियों को दूर करना बेहद कठिनाई होती है। यही ज़िन्दगी है, यदि लोग आपकी कमियाँ निकलने पर आ जाए तो आप समझ नही पाएंगे कि आप क्या है ? इतनी कमियाँ निकल देंगे कि अपको खुद से नफ़रत होने लगेगी।*
✍️ लेखक के कलम से इस लघुकथा का उद्देश्य : –
लोग तो कुछ भी कहेंगे पर आपको जो अच्छा लगे वो करो ,आपको जो ठीक लगे वो करो आपसे ज्यादा आपके हुनर को दूसरा कोई नहीं जान सकता है। दुनिया का और लोगों का काम तो दूसरों की कमियाँ निकलना है ही पर आपको जो अपने ज़िन्दगी में अच्छा लगे वो करो।

✍️ उज्ज्वल दास
(बोकारो स्टील सिटी -झारखण्ड)

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उज्ज्वल दास
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Bokaro Steel City
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