Sep 13, 2016 · कविता
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बदरा

उमड़ घुमड़ बरस रये बदरा
हुलस हुलस मन बह रयो कजरा
आय रयी है याद पुरानी
मीठीसी कोई प्रीत पुरानी
अधरों पे नाचे कोई कहानी
भूल उमरिया झूमे जवानी
अंग अंग में उमंग है फूटी
अहसासों की लडी़ अनूठी
पी के दरस की प्यासी अंखियां
पल पल राह देखें भूल के सखियां
बरस रहा आज जो सावन
हुआ बावरा मन का आंगन
देख लिपट पेड़ो से लताएं
झूम झूम कर मन को जलाएं
जलन विरह की पल पल सताए
प्यास मिलन की देह को जलाए
बरस बरस और तपन बढ़ाए
कहे सजनी साजन क्यूं ना आए
झूम झूम डोले अमुवा की डाली
गाये दूर कहीं कोयल मतवाली
उमड़ घुमड़ बरस गये बदरा

नूतन

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nutan agarwal
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