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बताये क्या तुम्हें क्या क्या हमारे घर नहीं होता

बताये क्या तुम्हें क्या क्या हमारे घर नहीं होता
वो हम जो सोचते है वो यहाँ अक्सर नहीं होता

तुम्हें धन-धान्य प्यारा हो हमें माँ-बाप दे दो तुम
बिना माँ-बाप के कोई बसेरा घर नहीं होता

हमें मुजरिम बनाया है तिरी झूठी गवाही ने
जो सच कह देते ख़ूने-दिल हमारे सर नहीं होता

उधारी मांगने तो वो हमारे घर पे आता था
चुकाने का समय आया तो वो घर पर नहीं होता

मुहब्बत है मुहब्बत है यहाँ कि फ़ैसला इसका
निगाहों से ही हो जाता है जो लड़ कर नहीं होता

जिसे हम चाहते है वो भी हमको टूट कर चाहे
जहाँ में इस तरह का वाक़या अक्सर नहीं होता

हमारे संस्कारों ने यही हमको सिखाया है
ज़माने में कोई माँ-बाप से बढ़कर नहीं होता

नज़ीर नज़र

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Nazir Nazar
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