Jun 7, 2017 · दोहे
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बढा दायरा सोच का

बढा दायरा सोच का , तेरा मनुज जरूर !
दुनिया से इंसानियत, किन्तु गयी अति दूर !!

कहने को तो आदमी, हुआ बहुत चालाक!
मानवता ने दे दिया, लेकिन उसे तलाक !!

करनी पे अपनी कभी,.. करना नहीं गुमान !
अच्छे अच्छों का यहाँ, टूट गया अभिमान !!
रमेश शर्मा

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RAMESH SHARMA
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दोहे की दो पंक्तियाँ, करती प्रखर प्रहार ! फीकी जिसके सामने, तलवारों की धार! !... View full profile
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