गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

बढ़ रही है तेरे मेरे बीच की खाई क्या करूं.

बढ़ रही है तेरे मेरे बीच की खाई क्या करूं.
फिर उस पर मैं और मेरी तनहाई क्या करूं.

हम तो आये थे तेरे शहर में तेरी जानिब.
पर तू और हाय रे तेरी रुसवाई क्या करूं.

मैने भी सोचा के चल भूल ही जाता हूँ उसे.
पर मेरे साथ चलती है तेरी परछाई क्या करूं.

तैरने का हुनर तो था पर डूब गया उनमें.
जब देखी नशीली आंखों की गहराई क्या करूं.

सुना है प्यार मोहब्बत तकदीर की बात है दीप.
मुकद्दर ने कर डाली मुझसे बेवफाई क्या करूं.
✍️✍️…दीप

31 May, 2020
9:00 PM

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