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बड़े साहब ( लघु कथा)

# बड़े साहब #
लाॅक डाउन का पालन कराने के लिए अटल चौराहे पर तैनात पी आर डी जवान रामदीन ने जब आती हुई कार को रोका और उसके पास जाकर ड्राइवर से पास माँगा तो पीछे की सीट पर बैठे बड़े साहब भड़क गए और बोले, “तुम जानते हो, मैं कौन हूँ? पास माँगते हो,तमीज नहीं है तुमको।”
“नहीं साहब, मैं नहीं जानता आप कौन हैं! मुझसे तो मेरे साहब ने जो बोला है,उसका पालन कर रहा हूँ ।”
“कौन है तुम्हारा साहब? बुलाओ उसको।मैं अभी बताता हूँ ड्यूटी कैसे की जाती है।”
दोनों के बीच हो रही बहस को सुनकर वहीं कुछ दूरी पर छाया में बैठा हुआ पुलिस इंस्पेक्टर भागा हुआ आया और देखा कि ये तो मुख्य विकास अधिकारी महोदय हैं।उनके पास पहुँच कर वह अपने पी आर डी जवान को ही डाँटने लगा। इतना ही नहीं उसने उससे भरे चौराहे पर उठक-बैठक लगाने को भी कहा।
इतने पर भी बड़े साहब का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वे बड़बड़ाते रहे। इंस्पेक्टर ने रामदीन से माफी भी मँगवाई।
चौराहे पर भीड़ खड़े होकर तमाशा देख रही थी। रामदीन सोच रहा था कि “जहाँ कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ते हैं और पालन कराने वाले सज़ा के हकदार होते हैं, ऐसे देश का भगवान ही मालिक है। ऐसे बड़े साहबों के कारण ही तो लोगों के अंदर से पुलिस का डर खत्म हो गया है और आए दिन यहाँ-वहाँ पुलिस पर लोग हमला कर देते हैं।”
बड़े साहब बिना पास दिखाए, गाड़ी में बैठकर आराम से चले गए।
डाॅ बिपिन पाण्डेय

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डाॅ. बिपिन पाण्डेय
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
सीतापुर
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साहित्य अध्येता Books: साझा संकलन कुंडलिनी लोक (संपादक - ओम नीरव) संपादित दोहा संगम (दोहा...
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