बटी हुई माँ

आज सुनीता का बैग उसकी छोटी बहू जल्दी-जल्दी तैयार कर रही थी क्योंकि आज से अगले छ: महीने के लिए सुनीता अपने बड़े बेटे के पास जाकर रहने वाली थी | तभी अनिल (सुनीता का बड़ा बेटा) का फ़ोन आया छोटी बहू ने बात की तो पता चला की वह शहर से बाहर है इस लिए माँ को लेने आज नहीं आ सकता फोन रखते हुए छोटी बहू रानी ने कहा की यह सब नाटक है माँ जी को ले जाना नहीं चाहते है अब मेरे सिर पर ही रहेगीं पैर पटकते हुए वह पति के कमरे में गयी और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, माँ जी नहीं जायेगीं अब डेरा यही जमा रहेगा बड़े भैया माँ जी को साथ रखना नहीं चाहते इसी लिए बहाना बना रहे है | ऐसा करो की माँ जी को स्टेशन जाकर ट्रेन पर बिठा दो | माँ दो स्टेशन बाद उतर जायेगीं और वहां से रिक्शा करके घर जा सकती है सामान भी क्या ज्यादा है? इतना ही है तो कुछ कपड़े बैग से कम कर देती हूँ, उठाने में आसानी होगी लेकिन मैं उन लोगो की चालाकी नहीं चलने दूंगी माँ जी आज ही जायेगीं बस | माँ जी की वजह से पिछले कितने दिनों से हम कहीं घूमने भी नहीं जा सके हैं | माँ जी के जाते ही हमने एक सरप्राइज आप के लिए रखा है | पत्नी की बात सुनील (सुनीता का छोटा बेटा) नहीं टाल सका और न चाहते हुए भी माँ को स्टेशन पर ले कर आ गया और माँ को १० रूपये का टिकट थमाते हुए समझाने लगा की माँ इस स्टेशन के बाद दो स्टेशन और आयेगा उसे छोड़ कर तीसरे पर उतर जाना और वहां से रिक्शा करके घर चली जाना वहां के बारे में आप को तो पता ही है | माँ ने भरी आँखों से पूछा कि अनिल लेने नहीं आ रहा है तो सुनील ने कहा बड़े भाईसाहब शहर से बाहर गये हैं उन्होंने कहा था की कल आकर ले जायेगे लेकिन माँ आप को तो पता है हम घर कितनी मुश्किल से चला रहे है, और रानी भी आप की वजह से बंधकर घर में रह गयी है कहीं बाहर घूमने भी नहीं जा सकी है सो कल हम लोग गोवा घूमने जा रहे है, इसलिए और वैसे भी आज से आपका भाई साहब के यहाँ रहने का टर्न है | माँ सुनती रही लेकिन कुछ बोली नहीं तभी सुनील बोला अच्छा माँ अब मैं चलता हूँ ट्रेन इसी प्लेटफार्म पर आयेगी आप बैठ तो जायेगीं ही सामान भी ज्यादा तो है नहीं, घर पर रानी मेरा इंतजार कर रही होगी इतना कहकर सुनील माँ को प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की कुर्सी पर बैठा छोड़ कर घर वापस आने के लिए मुडा | माँ के जर्जर हाथ आशीष देने को उठे तब तक सुनील मुड़कर चल चुका था माँ के आँखों में आँसू थे ट्रेन आने में लगभग सात से आठ घंटे का समय बाकी था| माँ को अनिल के पिता की याद आने लगी कभी-कभी वे कहते थे की सुनीता इस दुनियां से सभी को जाना है लेकिन मैं चाहता हूँ कि तू मेरे कंधे पर चल कर मरघट तक जाये ताकि मैं सुकून से मर सकूँ, यदि मैं पहले मर गया तो तेरे बहू-बेटे तेरी बड़ी दुर्गति करने वाले है | कभी-कभी हंसी-मजाक में कही गई बातें सत्य साबित हो जाती हैं | आज सुनीता पति की बातों को याद करके अतीत में खोती चली गयी | जब वह बिना सास वाले घर में व्याह करके आई थी तो उसे ससुर जी ने किसी प्रकार की कमी घर में महसूस नहीं होने दी थी और घर में आने के बाद घर की सारी चाभियाँ ससुर जी ने बड़े प्यार से मेरे हाँथों पर रखते हुए कहा था बहू आज से इस घर और रमेश (सुनीता का पति) की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है | आज मै तुम्हारी सास को दिए बचन से मुक्त हो गया ससुर जी बड़े खुश दिख रहे थे | धीरे-धीरे मैने घर की साफ-सफाई करने कुछ ही दिनों में घर का काया-कल्प कर दिया कब साल बीत गया पता ही न चला था और हमारी गोदी में भगवान ने अनिल को दे दिया अनिल के होने पर पूरा परिवार खुश था अनिल के बाबा तो ख़ुशी से पागल हो गये थे खूब उछाव-बधाव किया था पूरे गावं को भोज कराया गया था | फिर एक दिन ससुर जी घर की छत से फिसल कर इस तरह गिरे की फिर कभी न उठ सके उनकी मृत्यु के बाद घर से बड़ों का साया उठ गया लेकिन उनका आशीष सदैव हमारे साथ था पति की सरकारी नौकरी शहर की कोतवाली में लग गई थी धीरे-धीरे समय सामान्य हुआ कि सुनील को भगवान ने मेरी झोली में डाल दिया सुनील के पैदा होने पर रमेश बडे खुश थे कहते थे की मेरे पिता जी सुनील के रूप में मेरे घर में फिर से आ गये हैं | रमेश सुनील को बहुत प्यार करते थे सुनील के होने पर एक बार फिर पूरे गावं का भोज हुआ था | सभी सुनील को आशीष दे-देकर जा रहे थे मेरा छोटा सा परिवार बड़ा खुश था | रमेश कहते थे कि सुनीता मेरे घर में एक लड़की और हो जाये तो मेरा परिवार पूरा हो जायेगा | धीरे-धीरे समय कब पंख लगाकर उड़ने लगा पता ही न चला और दोनों बच्चों का दाखिला शहर के अच्छे स्कूल में करा दिया गया दोनों बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे अनिल को तो सरकार की तरफ से वजीफा भी मिलता था | एक बार हमारा पूरा परिवार इलाहाबाद संगम नहाने के लिए गया था सभी बड़े मजे से नहावन करके ‘लेटे हुए हनुमान जी’ के मंदिर पहुँच कर दर्शन करके वापस आ रहे थे तो मैने देखा की एक लगभग सात से आठ माह का एक बच्चा जो कपड़े में लिपटा सड़क के किनारे पर पड़ा रोये जा रहा था सायद काफी देर से लगातार रोने से उसकी आवाज भी साफ नहीं निकल पा रही थी मैने इधर उधर देखा वहां दूर-दूर तक कोई भी न था मेरा माथा ठनका की कोई इसे जानबूझ कर छोड़ गया है | मैने दौड़कर बच्चे को गोदी में उठा लिया देखा तो वह लड़की थी, सायद इसी लिए उसके-माँ-बाप उसे छोड़ गए थे | मुझे उन माता-पिता पर बड़ी घिन आ रही थी जो इस बच्ची को इस हाल में छोड़कर चले गए थे | बच्ची को बुखार था सायद काफी देर से रोने की वजह से आ गया था | मैंने उसे तुरंत डॉक्टर को दिखाकर दवा दिलाया फिर रमेश और हमने फैसला किया की इस बच्ची को भगवान ने हमें दिया है तो अब हम ही इसका पालन-पोषण करेंगे और उस बच्ची को घर ले आये धीरे-धीरे समय बीतता गया और अनिल को दूसरे शहर की एक कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी मिल गई सुनील भी भाई के साथ चला गया और काम सीखने लगा | अनिल की नौकरी लग चुकी थी तो अनिल के लिए रिश्ते आने लगे थे हमने भी सोचा की अब अनिल की शादी कर देनी चाहिए रमेश के साथ ही काम करने वाले वर्मा जी की लड़की के साथ अनिल का रिश्ता कर दिया गया बड़े धूम-धाम से अनिल की शादी कर दी गई अनिल भी शादी में २० दिन की छुट्टी लेकर आया था अनिल चाह रहा था की उसकी पत्नी उसके साथ जाये लेकिन मैने कहा की लोग क्या कहेगें ? और अभी तुम्हारी गृहस्थी बनी नहीं है जाकर शहर में एक अच्छा मकान देखो जहाँ ले जाकर बहू को रख सको सब ठीक-ठाक करके आना तो अगली बार बहू को भेज दूंगी अनिल चला गया उधर सुनील की भी अच्छी नौकरी लग गई अब वर्मा जी पीछे पड़कर अपनी बहन की लड़की के साथ सुनील का रिश्ता भी साल के अन्दर ही करा दिया काफी पैसा दोनों की शादी में खर्च करना पड गया था लेकिन रमेश ने सब सम्हाल लिया था | दिवाली पर अनिल और सुनील घर आये बहुएं भी थी पूरा परिवार भरा था दिवाली बड़ी धूम-धाम से मनाई गई |दिवाली के तीसरे दिन अनिल आकार मेरे पास बैठ कर बहू को साथ ले जाने की बात कहने लगा मैने कहा की पिता से पूछ कर बताउंगी तभी बहू जो कि दरवाजे के किनारे कड़ी होकर बात सुन रही थी एकदम से भड़क उठी और बोली इनको क्या ये तो अपने पति के साथ आराम से यहाँ पर हैं मैं नौकरानी की तरह दिन रात काम करती रहूँ बस इनको तो यही चाहिए किसी की ख़ुशी से क्या लेना-देना बहू बार-बार चिल्लाये जा रही थी संयोग से रमेश घर पर नहीं थे अनिल एक शब्द भी नहीं कह रहा था तब बड़ी मुश्किल से बहू को चुप कराया और मैने मन में सोच लिया था कि सिर्फ अनिल ही नही सुनील को भी उसकी पत्नी को साथ ले जाने के लिए कह देंगे | रमेश के शाम को घर वापस आने पर खाना खाने के बाद मैने बड़े प्यार से अनिल और सुनील को अपनी पत्नियों को साथ ले जाने की अनुमति देने के लिए माना लिया और सुबह अनिल और सुनील को उनकी पत्नियों के सामने साथ जाने की बात बता दी दोनों बड़े खुश थे हम भी बच्चों को खुश देखकर खुश थे दोनों बेटे अपनी पत्नियों के साथ दूसरे दिन शहर चले गये घर भारी-भारी लग रहा था, लेकिन क्या करती यही सत्य था अब घर में रमेश, मै और सोनी (बेटी) रह गये थे | घर का सारा काम मै करती थी सोनी का इस साल बी. एस. सी. का आख़िरी वर्ष था | मै उसे काम में नहीं उलझाना चाहती थी, वह पढ़नें में बहुत अच्छी थी | एक दिन जब वह शाम को कालेज से घर आई तो बहुत खुश थी आते ही मेरे गले लगकर बतया कि उसे कालेज से ही ‘कैम्पस सेलेक्शन’ द्वारा एक कंपनी में मैनेजर का पद मिल गया था | वह बहुत खुश थी रमेश भी सुनकर बहुत खुश थे, लेकिन मैं दुखी थी कि मेरी बेटी सोनी अब हमसे दूर हो जाएगी | और वह दिन आ गया जब सोनी को जाना था उसे बहुत कुछ दुनिया की नसीहतें सिखाते हुए न चाहते हुए भी भेजना पड़ा | अब हम और रमेश अकेले रह गये रमेश का रिटायमेंट भी निकट आ गया था हम दोनों सोच रहे थे कि एक जिम्मेदारी सोनी की शादी बची है उसे भी जल्दी ही पूरी कर दें, उसी दौरान सोनी का हमारे पास आना हुआ हमनें उससे पूछा कि तुझे कोई लड़का पसंद हो तो बता दे उसी से शादी करा दूंगी नहीं तो मै दूसरे लड़के से तेरी शादी करूंगी | पहले तो शादी के नाम पर आना-कानी करती रही किन्तु जोर करने पर उसने बताया की श्याम नाम का एक लड़का जो उसके साथ ही काम करता है उसे बहुत पसंद है | रमेश से बात करके मैने जल्दी ही श्याम के माता–पिता के पास सोनी का रिश्ता लेके भेज दिया और जल्दी ही शादी की तारीख निकल आई जैसा कि मुझे पहले ही मालूम था की अनिल और सुनील सोनी की शादी में हाथ बँटाने वाले नहीं हैं वैसा ही हुआ, फिर भी मै सबको मौका देना चाहती थी इसी लिए शादी की तारीख के साथ-साथ आर्थिक मदद करने के लिए भी दोनों बेटों को कहा लेंकिन जैसा मुझे मालूम ठीक वैसा ही हुआ, दोनों बहाना बना कर कन्नी कट गये | लेकिन सोनी मेरी जिम्मेदारी थी सो मैने निभाई और सोनी की शादी बड़े धूम-धाम से की और शादी में ही उसे बिदा कर दिया | बेटी की शादी में दोनों बेटे अपने परिवार के साथ आये और विवाह के उपरांत चले गये | सोनी के ससुराल जाने के बाद अब हम और रमेश अकेले रह गए, घर काटने को दौड़ता था | किससे कहें धीरे-धीरे सब सामान्य होता गया रमेश रिटायर हो गये रिटायर्मेंट का जो पैसा मिला सोनी की शादी में लिए कर्ज को पूरा करने में चला गया फिर भी सुकून था की मैने अपनी सभी के प्रति जिम्मेदारियाँ पूरी कर दी थी, अब सिर्फ जीवन यापन ही करना था | रमेश ने समय काटने और चार पैसे मिले इस लिए चौराहे पर एक कपड़े की दुकान किराये पर ले ली हम दोनों का समय उसी में कट जाता था सुबह नाश्ता करके रमेश दुकान पर चले जाते और मै घर का सारा काम निपटाकर बाद में दोपहर का खाना लेके दुकान पर चली जाती और शाम को साथ ही आते | समय निकलता गया हम दोनों ही बूढ़े हो चले थे एक दिन रमेश सुबह नाश्ता करके घर से निकल के सड़क पर पहुंचे ही थे कि,एक मोटर साईकिल चालक ने उन्हें टक्कर मार दी वे सड़क पर गिर पड़े | जब तक लोग आते वह मोटर साईकिल लेकर भाग निकला लोग रमेश को आनन-फानन में शहर के सरकारी अस्पताल में भरती कराया और मुझे सूचना दी मैं भागती-भागती अस्पताल पहुंची तो डॉक्टर ने बताया कि सिर पर काफी चोट आई है काफी खून बह गया है, उन्हें गहन-चिकित्सा कक्ष में रखा गया था | रमेश के अस्पताल में होने की खबर मैने सोनी, अनिल और सुनील सभी को दे दी लेकिन सबसे पहले सोनी अपने पति के साथ पहुंची दूसरे दिन अनिल और सुनील भी आ गये थे | रमेश को तीसरे दिन होश आया उनकी हालत में थोडा सुधार था लेकिन बोल नहीं पा रहे थे | डॉक्टर ने हम सभी को बारी-बारी जाकर मिलने की अनुमति दे दी थी सबसे बाद में मै गयी रमेश को इतना अधीर कभी भी हमने न देखा था मुश्किल से मुश्किल समय में भी उन्होंने हिम्मत न हारी थी जब मै उनके पास बैठी थी उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में रख लिया कुछ बोलना चाहते थे लेकिन बोल न सके उनकी सांसे तेज हो गयी आंखे उलटने लगी तभी पास खड़ी नर्स ने हमें बाहर करके डॉक्टर को बुलाया बाहर आकर मेरा दिल अनहोनी की आशंका से घबराने लगा डॉक्टर लगभग एक घंटे बाद आकार अनिल और सुनील को पास बुलाकर बेहद दुःख पूर्ण सूचना दी कि अधिक खून बह जाने और सिर पर गहरी चोट के कारण रमेश को बचा पाना संभव न रहा अब रमेश जी इस दुनिया में नहीं रहे | यह सुनकर मैं बेहोश होकर गिर पड़ी थी जब मुझे होश आया तो खुद को अस्पताल के विस्तार पर पाया सोनी मेरे पास बैठी थी | रमेश के बारे में सोचकर मैं रोने लगी कितनी अभागी थी कि उनकी अंतिम यात्रा में भी शामिल न हो सकी थी क्योंकि मुझे दूसरे दिन होश आया था तब तक उनका दाह-संस्कार हो चुका था | रमेश की तेरहवी के बाद दस-पंद्रह दिन तक सभी थे उसके बाद अनिल और सुनील मुझे अपने साथ ले जाने की बात करने लगे सोनी अपने साथ ले जाने की बात करती लेकिन मेरा मन घर में लगा था मै सोचती थी की मेरी डोली जिस घर में आई है अर्थी भी उसी घर से उठेगी | मैने कहा कि मैं किसी के साथ नहीं जाऊँगी लेकिन सभी के आगे मेरी एक न चली मुझे अनिल और सुनील के साथ जाना पड़ा | रमेश को गये एक साल भी न हुआ था कि अनिल और सुनील ने घर और खेत बेंचकर सदा–सदा के लिए शहर में अपना-अपना मकान ले लिया और हमारी देख रेख के लिए साल भर में छ:-छ: महीने के लिए मुझे बाँट लिया | यह पल मेरे जीवन का सबसे बुरा पल था सायद रमेश के जाने पर भी इतना दुःख नहीं हुआ जितना छ:-छ: महीने के लिए मुझे बांटे जाने का हुआ था | लेकिन क्या करती बेटे अपने थे और कोई सहारा न था सोनी ने कई बार साथ ले जाने की जिद की थी लेकिन बेटी के घर जाकर रहना अच्छा नहीं सोचकर हर बार टाल जाती थी वैसे मेरा भी मन अब छ:-छ: महीने की जिंदगी से ऊब चुका था | मेरी तन्द्रा तब टूटी जब जोर-जोर से मुझे हिलाते हुए कोई पूछ रहा था कि माँ-माँ यहाँ कहाँ ? देखा सामने सोनी अपने पति श्याम के साथ खड़ी थी सोनी को देख कर मै अपने आंसू न रोक सकी जो कि पहले से ही बहने के लिए बेताब थे | मैने पूछा सोनी तुम यहाँ कैसे आयी ? सोनी ने कहा आप से मिलने का मन कर रहा था सो पता चला कि आज कल आप सुनील भाई के पास हो सो चली आयी पर आप यहाँ कैसे हो ? आँखे से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे सोनी ने कहा कि भईया भाभी ने कुछ कहा क्या ? क्या हुआ माँ ? कुछ तो बोलो मेरी आंखे पहले ही सब कुछ बता चुकी थीं रही सही मैने आप बीती सुना डाली अब सोनी गुस्से से लाल हो चुकी थी लेकिन सुनीता ने उसे रोका तभी सुनीता की अनिल के घर जाने वाली ट्रेन आ गयी सुनीता फिर भी लाज के मरे अनिल के घर जाने के लिए ट्रेन की ओर बढ़ी लेकिन श्याम ने माँ का हाथ थाम लिया और बोला माँ मुझे आप की जरुरत है आप नानी बनने वाली है आप मेरे साथ चलिए और सोनी तथा श्याम ने बड़े प्यार से सुनीता को अपने घर ले आये सभी बड़े मजे में रहने लगे | उधर सुनील ने अनिल को फ़ोन पर माँ के जाने की सूचना दे दी थी लेकिन जब देर रात तक भी माँ अनिल के घर न पहुंची तो अनिल ने सुनील को फ़ोन किया कि माँ नहीं आई, माँ घर से तो गई थी पर गई कहाँ? किसी ने अपने सुख के आगे माँ को ढूढ़ने की जरूरत न समझी, सब के लिए तो मुसीबत बन चुकी माँ आसानी से टल चुकी थी | कुछ दिनों बाद सोनी को लड़का हुआ लड़के के होने को सुनकर जब एक दिन अनिल और सुनील परिवार के साथ सोनी के घर आये तो सोनी ने अनिल और सुनील से माँ के बारे में पूछा तो दोनों भाइयों ने बहाना बना दिया कि, माँ बेटी के घर नहीं आना चाहती थी इसलिए घर पर है | तभी सोनी ने माँ को आवाज लगाई माँ के सामने आने पर दोनों भाई अवाक् रह गये थे अपने करे पे शर्मिंदा थे सिर नीचे किये खड़े थे तभी सोनी ने स्टेशन पर माँ के मिलने और भाइयों की करतूतों के बारे में बताते हुए उन्हें खूब भला-बुरा कहा औए जमकर फटकार लगाई दोनों बेटे अनिल और सुनील माँ के चरणों में गिर गये | आखिर माँ का दिल ही तो था माँ ने ग़लती माफ कर दी | उससे पहले की अनिल और सुनील कुछ कह पाते सोनी ने एक तरफा फैसला सुनते हुए कहा कि आप दोनों ने माँ कहने और उनका प्यार पाने का अधिकार अब खो दिया है | माँ अब कहीं नहीं जाएगी यहीं मेरे साथ रहेगीं माँ ने भी सोनी की बातों में सहमति दे दी अनिल और सुनील अपना सा मुहं लेकर वापस आ गये तभी छोटे बच्चे की रोने की आवाज को सुनकर सुनीता बच्चे के पास चली गयी और सोनी ने अनिल और सुनील को बिदा करके बाहर का गेट बंद कर लिया |

पं. कृष्ण कुमार शर्मा

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श्री कृष्ण कुमार शर्मा एम.ए.(हिंदी & शिक्षाशास्त्र), बी.एड., एम.फिल.(हिंदी), पीएच. डी.(हिंदी) अध्ययनरत अध्यापक एवं इंटरनेशनल...
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