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बच्चों जैसे पौधे

सूने घर के बंजर आंगन में,कुशा रूप उगे रोंये
कुछ बीजों से सजी है बगिया,कुछ गमलों ने संजोए।
हर एक बीज बूढ़ी अम्मा ने था, बहुत स्नेह से बोया
वही बीज अंकुर बन फूटा,था गहराई में जो सोया।
बच्चों जैसे होते पौधे,कह पोषण करती अम्मा।
सही खाद, पानी ,धूप देना था उनका जिम्मा।
कभी गुदाई छोटी खुर्पी से, कभी सिंचाई करती।
कभी कटाई कभी छंटाई,भी सख्ती से करती।
अगर सूखता कोई पौधा झट हरे भरे संग धरती।
कहती साथ भाई-बहनों का, पौधे तन ऊर्जा भरती।

पूछो तो कहती पौधे तो खिलता बचपन
अपने पन से महकाते ये,उम्र हो चाहे पचपन।
नये उगाना रोज सींचना,इनका हृदय न दुखाना।
पतझड़ में बिखरेंगे पत्ते, जड़ से इन्हें न कटाना।
जैसे बालक जान डालते सूने से आंगन में
वैसे ये भी जड़ी-औषधि, मरते पर्यावरण में।
मां वसुधा की हालत पर देखो हुए ये पौधे उदास
हरा भरा करदो नीलम,जागे नन्हें पौधों में उजास।

नीलम शर्मा ✍️

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Neelam Sharma
Neelam Sharma
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