बच्चों की ज़िद ( बाल लघुकथा)

दिनांक 15/5/19

सुमि सुबह उठ कर रोज रोती और ज़िद बहुत करती थी । उसके सुबह सुबह रोने से सब परेशान हो जाते थे ।
एक दिन सुमि की माँ संगीता ने पूछा :
” बेटी आप रोती क्यो है , कोई परेशानी है आपकी तबियत ठीक नही है ।
आपको जो अच्छा लगे वह
बताओ ।”
सुमि रोते हुए बोली :
” नहीं मुझे कुछ नहीं चाहिए, मेरा रोने का मन हो रहा है बस ।”
अब घर के सभी लोग हॅस दिये, इससे सुमि और रोने लगी ।”
लेकिन संगीता समझ गयी कि सुमि को मानोवैज्ञानिकतौर समझाने की जरूरत है ।
वह सुमि को बच्चो को दाना खिलाती हुई चूडियां के पास ले गयी और बोली देखो सुमि कितने प्यारे प्यारे बच्चे है और उनकी माँ कितने प्यार से खाना ला ला कर खिला रही है, बच्चे भी खूब खुश है रो भी नही रहे है ना , कितने स्वस्थ्य है ये बच्चे, बेटी रोने से सेहत खराब होती है , और रोना कोई अच्छी बात नहीं है ।”
यह देख कर सुमि खुश हो गयी , और बोली :
” माँ मैं समझ गयी , आप हम बच्चों को कितना प्यार लाड देती है, और हम ज़िद करते रहते और परेशान करते है । अब अगर ये चिडियाँ भी रूठ कर बैठ जाऐ तो ये बच्चे तो भूखे ही रह जाऐगे । अब मैं कभी आपको परेशान नहीं करूँगी , जो आप खिलाऐगी वह प्यार से खाऊँगी अब तो आप खुश हो ना माँ।”
सुमि की प्यारी प्यारी बातों से संगीता की आँखो में आंसू आ गये और उसने प्यार से सुमि को बाहों में ले लिया ।”

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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