“बच्चे “

जो कोरे कागज सी खुशबू लिये
सुबह सुबह बस्तों का बोझ लिये
नये रंग , नये ढंग ,नये तेवर लिये
चलते हैं ज़िंदगी को मनाने के लिये
उन नौनिहालों से जवाब तो पूछिये
कि किस तरह बेरहम बस्ते उनकी
नाज़ुक पीठ पर घुड़सवारी करते
नन्ही-सी गर्दन पर मानो चाबुक मारते,
कब तक चलना है , उन्हे पता नहीं
दायें मुड़, बायें मुड़, तेज चल ,
मगर क्यों ,कहाँ , पता नहीं ,
ये जिन्दगी के तार जोड़ते,
सपनों की तितलियों को पकड़ते,
हमारे प्यारे नन्हे, देश के बच्चे.
…निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको" View full profile
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