बच्चे नहीं जानते अभी

बच्चे नहीं जानते अभी
कि कैसे फूटती हैं यादें
मील के पत्थरों से
बच्चे यह भी नहीं जानते
कि किस तरह इंतजार करता है घर
ललक उठता है देहरी का मन
और किस तरह
झाँक उठती हैं मुँडेरें
बच्चे यह भी नहीं जानते
कि आंगन में लेटे
पिता की खामोशी कितना चीखती है
और रसोई में रोटी सेकतीं
माँ की उँगलियाँ
बार बार गर्म तवा कयों छू लेतीं हैं
ये सब तभी जानेंगे बच्चे
जब बरसों बाद लौटेंगे घर !

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