कविता · Reading time: 1 minute

बचपन

बचपन का जमाना मिलने वाला कहां,
कतरन का खिलौना सिलने वाला कहां।

बारिश में दौड़- दौड़ कर नहाना कहां,
स्कूल से घर भागने का बहाना कहां।

कागज की नाव का नाविक चींटा कहां,
मेरे चोटियों का सफेद वाला फिता कहां।

लुका-छिपी वाला पुराना खंडहर कहां ,
खेलने वाला कंचा, कंकड़-पत्थर कहां।

किताबों से ज्यादा खिलौने वाला बस्ता कहां,
पगडंडी,बाग,खेत-खलिहान वाला रस्ता कहां।

नानी,दादी के राजा-रानी वाले किस्से कहां,
पड़ोसी के शादी के मिठाई वाले हिस्से कहां।

मिट्टी का घर, खिलौने, गुड्डे-गुड़िया कहां,
पांच, दस, पैसे की चुरन की पुड़िया कहां।

दौड़ती- भागती जिंदगी अब बचपन कहां,
हर तरफ गर्द-गुबार शांत वाला उपवन कहां।

नूरफातिमा खातून नूरी
जिला-कुशीनगर

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