कविता · Reading time: 1 minute

बचपन

न जाने कहां चले गए वो दिन
जब न उठने का न सोने का समय था,
यूं हीं खेलते खेलते सो जाते थे,
कभी मां की गोद में तो कभी मिट्टी की सेज पे।
अब भाग रहें है, पैसे कमाने को,
भूल गए दिन के चैन और रातों की नींद को।
सब मोह माया का जाल है,
अब न रिशतों की अहमियत है, न अपनों की खबर है।
कमा रहे है पैसे जिस्म को गवांकर,
फिर उसी जिस्म को पा रहे है कमाई को लूटाकर।
याद करते हैं वो दिन, जिद्द भी हमारी थी, जनून भी हमारा था,
जमीन भी हमारी थी और असमान भी हमारा था।
लौटा दे हमें वो बचपन के दिन,
ले ले चाहे ये सारी खुदाई।
न जाने कहां चले गए वो दिन, न जाने कहां चले गए वो दिन

गुरू विरक
सिरसा(हरियाणा)

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