.
Skip to content

बचपन

राजेश

राजेश"ललित" शर्मा

कविता

February 18, 2017

बचपन में बचपन खोना कौन चाहता है?कुछ बच्चों को रोज़ देखता हूँ ;मेहनत करके कमाते हुये बच्चे
अच्छे नहीं लगते?स्कूल जाने और खेलने खाने की
उम्र में ये सब करना———?

——————————————
“बचपन”
——————————————
बचपन में बचपन
खो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का गलियों
गुम हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का यूँ
धूल फाँकना
कैसा लगता है?

बचपन को यह
बोझ उठाना
कैसा लगता है?

बचपन का यूँ
कूड़ा बीनना
कैसा लगता है?

बचपन का
मुश्किल हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन में यूँ
आँसू बहाना
कैसा लगता है?

बचपन ही बचपन
में सूनापन
कैसा लगता है?

बात बात पर
बचपन का गाली
हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का
क़तरा क़तरा
हो जाना
कैसा लगता है?
———————
राजेश”ललित”शर्मा

Author
राजेश
मैंने हिंदी को अपनी माँ की वजह से अपनाया,वह हिंदी अध्यापिका थीं।हिंदी साहित्य के प्रति उनकी रुचि ने मुझे प्रेरणा दी।मैंने लगभग सभी विश्व के और भारत के मूर्धन्य साहित्यकारों को पढ़ा और अचानक ही एक दिन भाव उमड़े और... Read more
Recommended Posts
कविता :-- काम करने चला बचपन !!
कविता :-- काम करने चला बचपन !! खानें की चाह पे खोया बचपन रातों को राह पे सोया बचपन , सहम-सहम के रोया बचपन फिर... Read more
( कविता ) बचपन की यादें
वो बचपन की यादें, बड़ी ही सुहानी बहुत याद आते वो किस्से कहानी । वो गुल्ली, वो डंडा, वो कंचों का खेला मुहल्ले मे लगता... Read more
भोला बचपन
सुनो, क्या आपने पहचाना मुझे? अरे भाई! मैं हूं भोला-मस्तमोला बचपन। खेल रहा है भोला बचपन,रोज नए अहसासों से, मन में उमंग भरने वाले, शरारती... Read more
भीख के कटोरे में मजूबूरी को भरकर... ट्रॅफिक सिग्नल पे ख्वाबों को बेच कर... ज़रूरत की प्यास बुझाता बचपन......... नन्हे से जिस्म से करतब दिखा... Read more