बचपन की रामलीला

बचपन की रामलीला
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आज भी याद आता है
दशहरे के दौरान
नाना के घर जाना,
बहाना तो होता था
बस रामलीला देखना।
बड़ा मजा आता था
मामा नाना के साथ
गाँव की रामलीला में,
तब आज की तरह
सब हाइटेक नहीं था
पेट्रोमैकक्स की रौशनी में
चौधरी नाना के दरवाजे पर
अधिकांश कलाकार गाँव के
हल्की ठंड के बीच
कभी कभी कलाकारों को
छूकर देखना
बीच बीच में झपकी की आना,
कभी कभी वहीं सो जाना
दशहरे के दिन रावन दहन
और मेले का उल्लास
आज भी स्मृति शेष है।
अब न वो समय है
न ही वो उल्लास।
अब सब कुछ बनावटी सा लगता है
पहले की तरह अब रामलीला भी
गांव गांव कहाँ होती है?
हम भी अब एडवांस हो गये हैं।
दरी पर बैठकर रामलीला
देखने का रिवाज भी कहाँ रहा?
लोगों में भी कहाँ
वो सद्भाव रहा।
अब तो बस बचपन की रामलीला
बहुत याद आती है,
हमारे बच्चों को
किताबी रामलीला ही रास आती है।
🖋सुधीर श्रीवास्तव

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