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बचपन की बारिश

satyendra agrawal

satyendra agrawal

कविता

June 29, 2017

वर्षा की फुहारों में मन करता है
रिमझिम के गीत गाते बिना छाते सडको पर दौड़ने का
घटाओ से घिरे बादलो को छूने का
अठखेलिया करती नटखट पवन के संग खेलने का
मेघ गर्जन करते बादल,चुंधियाती बिजलियों के
साथ धरती पर बिछी हरियाली की चादर को छूने का
घने अंधियारे मे मन को रोमांचित करने का
मंद मंद अलसाई धूप को गले लगाने का
आकांषये तो बहुत है बचपन की यादों लिपटने का
वास्तविक जीवन रोकता है उन्मुक्त जीवन जीने को
कितना खोया है बड़े हो कर

डॉ सत्येन्द्र कुमार अग्रवाल

Author
satyendra agrawal
चिकित्सा के दौरान जीवन मृत्यु को नजदीक से देखा है ईश्वर की इस कृति को जानने के लिए केवल विज्ञान की नजर पर्याप्त नहीं है ,अंतर्मन के चक्षु जागृत करना होगा
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