कविता · Reading time: 1 minute

बचपन का वो सफर

बैठे बैठे यूं ही कुछ हसीं लम्हों को याद करते हैं,
चलो आज वापस बचपन की राहों पर निकल पड़ते हैं,
जहां ना होती आज की चिंता और कल की फ़िक्र हमें,
यादों में आज अपनी चलो फिर उन पलों को जीते हैं,
हर वक़्त मौज मस्ती कर डांट जो खाते थे मां पापा की,
उस डांट को एहसास कर फिर अपने चेहरे पर असल मुस्कान ले आते हैं,
वो पूरे दिन शाम होने का इंतज़ार करना,
शाम होते ही पार्क में दोस्तों संग दौड़कर जाना,
खेल खेल में अपने हजारों चोट लगवाकर भी कुछ न कहना,
डांट पड़ने पर रोते रोते कहीं भी सो जाना पर आंख बिस्तर पर खुलना,
स्कूल न जाने के हज़ारों बहाने बनाना,
क्लास में पड़ी टीचर की डांट को बड़ा चड़ाकर उनकी ही गलती बताना,
वो स्कूल की प्रार्थना में की गई मस्ती,
लंच से पहले ही वो टिफिन खाली करके कुछ न करने की हस्ती,
वो लंच होते ही भागकर कैंटीन में जाना और खूब दादागिरी दिखाना,
वो स्कूल की ग्रुप फोटो के लिए तैयार होना और दोस्तों के साथ बैंट लगाना,
सच वो लम्हे आज भी यादों को तरोताजा करते हैं,
जिंदगी की भागदौड़ में जीने का सुकून देते हैं,
बचपन की एलबम में जीने का नया तरीका हम खोजते हैं,
जब भी याद करते उन लम्हों को हम ,
जहां इक पल की दुश्मनी और सालों की दोस्ती होती थी
तो अपनी ही नादानियों और बेवकूफी पर खूब हंसते हैं

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