बचपन और बारिश

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आज सुबह से ही मौसम बड़ा है अच्छा,
ढ़ूढ़े मेरा मन बावरा वो छोटा-सा बच्चा।

वहीं सुहाने दिन, वो बचपन, वो बारिश,
जवाँ हो रही थी हर तमन्ना हर ख्वाहिश।

जब माँ समझाती दे छोटा-सा एक छाता,
दिल भींगना चाहता बात तनिक न भाता।

ये बड़े-बड़े रेनकोट, ये प्लास्टिक के बूट,
उतार कर छुप भागते थे बोल कर झूठ।

किसी बहाने से बारिश में गीला हो जाना,
`इसने भींगा दिया`एक मासूम-सा बहाना।

गीली-मिट्टी से कपड़े व चेहरे का मेकअप,
बार्षा के पानी,कीचड़ में खेलते थे छपाछप।

कानों में बूंदों की बजती थी जब सरगम,
खिला चेहरा खुशी से भींगे,नाचे छम-छम।

मौजमस्ती की होड़ में पुरानी रंजिश भूलना,
वो बादल-बिजली से डरकर शोर मचाना।

ना जाने कहाँ खो गया बचपन का खजाना,
याद आता है मुझको वो गुजरा हुआ जमाना।
????–लक्ष्मी सिंह?☺

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