23.7k Members 49.9k Posts

बघेली मुक्तक और समसामयिक शायरी

आंधर बनें बटइया,अपनेन क बांटत हं,
सुधबन के मुंहु, कुकुरबे चाटत हं।
एंह दउर मं केहू क का कही बताब,
अपनन के हाथ, अपनेन काटत हं।

छोड़ दो कोशिशें किसी को जगाने की,
अब कहां फिक्र है किसी को ज़माने की।

1 Like · 272 Views
अमरेश गौतम'अयुज'
अमरेश गौतम'अयुज'
रीवा,मध्य प्रदेश
23 Posts · 937 Views
कवि/पात्रोपाधि अभियन्ता Books: अनकहे पहलू(काव्य संग्रह) अंजुमन(साझा संग्रह) मुसाफिर(साझा संग्रह) साहित्य उदय(साझा संग्रह) काव्य अंकुर(साझा...