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“बगुला-भगत”

“बगुला-भगत”
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चतुराई होती, चरम पार;
इतने तेज इसके ,नयन;
जैसे बगुला हो,
इसकी बहन।

बड़ों-बड़ों से होती,
इसकी संगत,
निपुणता से करे ये ,
सबकी आव-भगत।
तब तो नाम इसका,
है”बगुला-भगत”।

“बकोध्यानम” ही,
इसका गुण,
मस्त रहता ये,
अपनी ही धुन;
जानकारी की होती,
इसे बहुत अभाव,
लेकिन हर जगह,
छोड़ता ये प्रभाव।

एक बार जो ,
इसके पकड़ में आए,
बेचैन हो वो,
बहुत छटपटाए,
चाहे जगह कैसी भी हो,
ये सदा अपना ही,
गुण गाये।

ये अपने गर्दन,
बहुत ही लचकाता,
हर बात में ये,
अपनी हाथ चमकाता।
ये अपने भोजन को,
सीधे निगल जाता।
मगर ये थोड़ा,
शिष्टाचार भी दिखाता।

चलता ये तेजी से,
जैसे कोई धावक हो,
इसे ठंड लगती कम,
जैसे पास ही पावक हो,
हर मौसम रहता ये,
सदा ही फिट-फाट,
बगुले की तरह ही,
दिखता है साफ।
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…… ✍️पंकज “कर्ण”
…………कटिहार।।

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