गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

बग़ैर बरसे ही घटाओं को खोते हुए पाया हमने

बग़ैर बरसे ही घटाओं को खोते हुए पाया हमने
ख़ेल तमाशा ही उल्फ़त में होते हुए पाया हमने

उड़ती खबरें जलती तस्वीरें अख़बारी तहरीरें
हरेक शख़्स को कहीं न कहीं रोते हुए पाया हमने

जो करते हैं अपना काम बड़ी मेहनत से लगन से
उनको ही गहरी नींदों में सोते हुए पाया हमने

उन के हिस्से में भी कभी कुछ तो दाद आए जिन्हें
काग़ज़ पर क़लम से एहसास बोते हुए पाया हमने

ज़माना बड़े मज़े में है जाने कैसे नशे में है
खोकर होश ये मदहोशि में खोते हुए पाया हमने

पल भर में जैसे उम्र ही गुज़ार आए उस दुनियाँ में
जहाँ महसूस खुदी को दिल में होते हुए पाया हमने

सफ़ेद ही सफ़ेद दिखाया गया जिन बच्चों को उन्हें
‘सरु’ हक़ीकतों की दुनियाँ में रोते हुए पाया हमने

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