मुक्तक · Reading time: 1 minute

“बकरा”

“बकरा”
🐐🐐
………………१……………..
बकरा तो हमेशा, घास खाए।
मानव बकरा ही, काट खाए।
बकरा बेचारा , अब क्या करे,
वो सिर्फ कटे और छटपटाए।
………………..२………………. .
वो तो सिर्फ अपना, हिम्मत हारे।
अब बस , एक -दूसरे को निहारे।
याद करे वो अब भी मालिक को,
अगर मिल जाए, जो कुछ सहारे।
……………….३…………………….
रहता है क्या भला , गलती उसकी।
जिससे जीवन मिला है, इसे रिस्की।
बकरा तो बस एक निर्दोष प्राणी है;
पता नही , नजर लगी इसे किसकी।
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.. ✍️पंकज “कर्ण”

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