कविता · Reading time: 1 minute

बंधन

सही-ग़लत,
ग़लत सही की परिभाषा,
किसने बनाए नियम,
और इन नियमों की भाषा,
बंधन महज़ मानने भर से सिर चढ़े,
या ज़बरदस्ती थे सब पर मढ़ें,
अंकुश मन के नियंत्रण पर थे सब,
नाम सभ्यता और संस्कृति के गढ़ें,
बेड़ियाँ आत्मा की क़ैद के लिए,
शिष्टाचार जैसे सुंदर शब्दों में जड़े,
आत्मा-मन स्वच्छंद परिंदे से,
रहे क्यूँ आजीवन पिंजरे में पड़े,
संस्कारों के नाम पर,
नए नए कारावास बढ़े,
मुक्ति के लिए बढ़ती छटपटाहट,
पल पल हर पल नए क़यास खड़े
उन्मुक्त होने को हैं प्रयास कड़े,
उन्मुक्त होने को हैं प्रयास कड़े……..

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