May 3, 2021 · कविता
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बंगाल में जुमलेराम

छोड़ कोरोना की चिन्ता
तुम बंगाल में जा बैठे
महीनो खून पसीना बहाकर
खाली हाथ आ लौटे ।

नही देखा भारत को तुमने
ना ही कोरोना बीमारी
पीएम एचएम सबके सब को
बंगाल में रैली प्यारी ।

गायब हो गए दिसम्बर से
दिल्ली की कुर्सी छोड़ खाली
बंगाल में हिन्दू-मुसलिम करते
इनको साम्प्रदायिकता प्यारी ।

ना ही लगाए मास्क किसी ने
ना पालन की दो गज दूरी
समर्थकों के मन जहर भरते
गले लगा करते चुनावी रैली ।

एक ही मुद्दा तुम अपनाते
साम्प्रदायिकता को आगे ले आते
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई
भाईचारे पर प्रश्नचिह्न लगाते ।

राष्ट्रवाद का जुमला फैंका
राष्ट्र को देकर दोखा
कोरोना में झोंकी जनता
यमराज को करके नीलामी ।

पीएम एचएम भाषण देते
दीदी ओ दीदी चिल्लाते
खरीददारी कर सिपहसलारो की
चुनावो में जमकर धन उड़ाते ।

साशन-प्रशाशन गायब हो जाता
जैसे ही चुनाव आ जाते
भाड़ में जाय भारत की जनता
चुनावी रैलियों में सब लग जाते।

हिन्दू-मुस्लिम कब तक करोगे
कब तक करोगे भारत-पाक
बेरोजगारी- महगाई को छोड़कर
विकास का गाओगे कब तक झूठा राग ।

हर तबका बेचैन कर दिया
सड़क पर ला दिया पूरा समाज
क्षात्र-किसान-मजदूर आंदोलन कर रहे
तुम चुगा रहे मोर को अनाज ।

बैच कर खा ली पूरी सम्पत्ति
एलआईसी, बैंक,ओएनजीसी
बीएसएनल की साँस रुक रही
दावा कर रहे पाँच ट्रिलियन इकॉनमी ।

यूके भेज रहा कॉन्सेनट्रेटर
यूएस भेज रहा रैमडे-ऑक्सिजन
मास्क नही ना ही पीपीई किट
हाथ फैला रहा अपना देश महान ।

बेरोजगारी का मातम देखो
घर घर मे है हाहाकार
युवा चूम रहा रस्सी का फंदा
किसान हो गया आत्महत्या के नाम ।

विस्व गुरु अब देश हो गया
आत्मनिर्भर हो गया कोरोना काल
नेपाल तुमको धमकी देता
चीन के आगे तुम्हारे हलक में प्राण ।

गरीब और गरीब हो गया
जीएसटी,नोटबन्दी ने कर दिया काम तमाम
अम्बानी अडानी मालामाल हो गए
जय श्रीराम, जय जय श्रीराम ।।

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सोलंकी प्रशांत
सोलंकी प्रशांत
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मैं कुछ नही, सिवाय चलती-रूकती आत्मा के । इस जन्म मेरा, सामाजिक लिवास सोलंकी प्रशांत... View full profile
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