कविता · Reading time: 1 minute

बँट रहा हिंदुस्तान

नौजवान संभाल कमान
बँट रहा हिंदुस्तान

धर्म बनाए जात बनाई
राजनीति की बिसात बनाई
बनाए धंधे कराए दंगे
कटा हिंदू या कटा मुस्लमान
तमाशा देख रही आलाकमान
बँट रहा हिंदुस्तान

वोट बनाए नोट बनाए
लोकतंत्र को चोट पहुचाएँ
बाँटा नशा नौजवान डँसा
फिर बन चले हम गुलाम
स्वर्ग हमारा बन रहा शमशान
बँट रहा हिंदुस्तान

सियासत के मसले सारे है
आजाद कश्मीर के नारे है
सब मौन ध्यान दे कौन
अदालतो मे रह गयी गीता-कुरान
अपने घर मे ही अपने अंजान
बँट रहा हिंदुस्तान।

खुद बचो और देश बचाओ
षडयंत्रकारियों को मार भगाओ
हम इंसान एक वही ईमान
बंद हो ये बँटवारों की दुकान
फले फूले गुलशन एक यही “अरमान”
जय जवान जय किसान।।

#अरमान

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