कविता · Reading time: 1 minute

फौजी का खाना

फोजी का खाना …
क्या अपनी मांगे मनवाने को , फोजी सड़को पे उतर आएं
कर्तव्य भूल , बंदूख छोड़ ,, सड़को पे आके नारे लगाएं ,,
क्या ऐसा करने से ही , बहरी सरकारों की नींद खुल पायेगी
पर इससे पहले तो पाकिस्तानी फौज , कन्याकुमारी तक पौच जायेगी ।।

नेता या फोजी दोनों में से, कोण किस खाने का हकदार है
कार्येवाही करनी होगी , कोण करता ऐसा भरस्टाचार है
अफसर , मेजर जो भी दोषी मिले , फांशी पे लटका दो ,,
फोजी हर बन्दे से ऊपर है , मिलके देश आज दिखा दो।।

बहुत कम अफसर बेइमान हैं , जानते हैं
बहुत कम फोजी ऐसे खाते हैं , ये भी मानते हैं ,,,
पर जब तक एक भी फोजी परेशान रहेगा ,, आवाज उठती रहेगी
क्या ये सरकार भी पहले जैसी निकली ,, जनता यही पूछती रहेगी ।।

कोई अफसर ये ना कहे , कि देश को दिखाने से पहले हमको दिखाते
अगर जवान को कोई दिक्कत थी ,, तो सीधे आकार हमको बताते ,,,
दिलासा और वादा ,, और नोकरियो में ही रहने दो ।।
फोजी का पुरे हक़ है ,, जनता को सब कुछ कहने को।

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कलम को हमेशा सच बोलना चाहये ,, अच्छा तो कई बार नेता भी बोल लेता है ।।
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