फोक्ट का तमाशा

यह रविवार था। वीणा के लिए सुखद सुहानी भोर का आनन्द लेने का दिन। घर में सब सो रहे थे। वीणा ने एक गहरी साँस ली और चाय बना कर इत्मीनान से बालकोनी में रखी चियर पर बैठ गई। पति और बच्चे दस बजे से पहले उठने वाले नहीं थे, तो नाश्ता बनाने के लिए उसके पास तीन घंटे थे ! इत्मीनान सुकून शांति से अखबार पढ़ते हुए, चिड़ियों का कलरव सुनते हुए, मनपसंद बिस्कुट को धीरे – धीरे कुतरते हुए चाय का एक एक सिप…… आह… ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत है…!
अभी वीणा ने अपनी खूबसूरत सुबह के कुछ लम्हे ही बिताये थे कि सामने लॉन से उठता शोर उसे डिस्टर्ब करने लगा। वीणा ने उड़ती सी निगाह एकत्रित भीड़ पर डाली। सामने के फ्लैट में कुछ महीने पहले रहने आये स्वामी जी का रविवारीय प्रवचन और लोगों की भीड़ हर रविवार का कॉमन सीन बन चुकी थी। हर रविवार गुरु जी के अनुयायी आते और स्वामी जी अपने छोटे से फ्लैट से बाहर निकल लॉन में मजमा लगा कर बैठ जाते। भक्तजन उनके सामने पैसों का ढेर लगा देते और घण्टे भर के प्रवचन के बाद स्वामी जी एक कुशल नट के समान शब्दों की कलाबाजियां दिखा कर वाह वाही के लाखों रुपये समेटे अपने फ्लैट में घुस जाते। और एक हफ्ते तक सब शान्त।
पर आज कुछ अलग बात थी। स्वामी जी के प्रवचनों की कलाबाजियों की बजाय किसी औरत के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आ रहीं थीं।
टिंग…..ट्रांग…
दरवाजे की घण्टी ने वीणा के विचारों की बनती बिगड़ती तस्वीर पर ठण्डा जल फैंक दिया, सारी तस्वीर धुल पुंछ गई।
वीणा जानती थी यह दूधवाले का टाइम है। रसोईघर से बर्तन उठा उसने जल्दी से दरवाज़ा खोला।
….राम राम…. बीबी जी…
राम….” वीणा को बोलने का मौका दिए बिना दूधवाले की शब्द रेल अनवरत चल रही थी….!
बीबी जी आज तो कमाल हो गया! सामने वाले बाबा जी का तो आज भांडा ही फूट गया… देखो तो… बड़ा बाबा बना फिरता था…. पडोस की लड़की को लेकर भागा हुआ था और वो भी नाबालिग! आज बीवी ने आकर खूब पीटा बाबा को। लोगों के चढ़ाए पैसे भी ले गई… लाख से कम तो क्या ही होंगे। बीवी के भाई भी थे साथ में, बाबा के घर का सामान भी ले गए। भक्तों के दिए लैपटॉप, टीवी सब। ऊपर से पुलिस बुला कर जेल भी करवा दी बाबा को, नाबालिग को भगाने के आरोप में…. हंह हंह हंह….
दूधवाला चटखारे लेकर कहानी बता चला गया।
वीणा सामने खड़े लोगों को देख रही थी जो धर्म के नाम पर लुट-पिट कर आज देखो रहे थे… फोक्ट का तमाशा…!
© डॉ प्रिया सूफ़ी

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