फूल, पत्ते जो डाली लगे

फूल-पत्ते जो डाली लगे ।
ठंड उनको भी भारी लगे ।।

ग़र सच्ची जो अरज़ी लगे ।
समझो उसकी ही मरज़ी लगे ।।

कोई कंबल उड़ा दो इन्हें ।
बाहरी न बीमारी लगे ।।

मुआफ़ी से जोड़ा बहुत ।
ज़िन्दग़ी फिर भी टूटी लगे ।।

आदमी में नहीं आदमी ।
बात उसकी न अच्छी लगे ।।

पानी मिलता बहुत है यहाँ ।
रूह लेकिन ये प्यासी लगे ।।

मुस्कुराती हैं जो सूरतें ।
आँख उनकी भी रोती लगे ।।

सजाया जिसे शौक से ।
च़ीज वो ही तो बिखरी लगे ।।

छोड़ दो ये ग़ुम़ाँ ” ईश्वर” ।
शायरी तेरी अच्छी लगे ।।

.. – ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

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