फूल की महक

फूल वो फूल नहीं जो अपनी महक दे न सके गुलशन को ,
चन्दन वो चन्दन नहीं जो शीतलता दे न सके उपवन को I

फूल को गुमान है कि वह केवल अपने लिए ही जीवन जिया ,
अपने आस-पास किसी को अपनी तनिक खुसबू भी न दिया ,
अपने को फुलवारी का राजा कहलाने में ख़ुशी महसूस किया ,
दूसरे फूलों की महक को प्यारे उपवन में बिखरने भी न दिया ,

फूल वो फूल नहीं जो अपनी महक दे न सके इस गुलशन को ,
सूरज वो सूरज नहीं जो प्रकाश की किरणें दे न सके चमन को I

अनोखे फूल की महक :

अनोखा फूल “जहाँ” की ख़ुशी के लिए करता अपना बलिदान ,
“डाली” से बिछुड़कर भी हंसते-2 होता जग की खातिर कुर्बान ,
“इंसान” के जीवन का हर पल महकाने में लुटाता अपनी जान ,
बुझी ज्योति और मालिक के चरणों से उसका प्यार एक समान ,

“फूल” वो फूल नहीं जो अपनी महक दे न सके इस गुलशन को,
“सोना” वो “सोना” नहीं जो अपनी चमक दे न सके आभूषण को I

“राज” अनोखे फूल की पंखुड़ी से अपनी “कलम” को सजाता गया,
संकुचित राह से निकलकर इंसानियत की राह की ओर बढ़ता गया,
प्यार-मोहब्बत व अमन के पैगाम से “कलम” को रोशनी देता गया,
दूसरों की खुशियों में “जग के मालिक” की ख़ुशी को तलाशता गया ,

“फूल” वो “फूल” नहीं जो अपनी महक दे न सके इस गुलशन को ,
संत वो संत नहीं जो जन-2 में फैला न सके अमन व इंसानियत को I

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देशराज “राज”

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