मुक्तक

फूटे हुए मटके में जज्बात भरती हूँ।
भरता नहीं है फिर भी दिन-रात भरती हूँ।
मिटते नहीं हैं दर्द बेजुबान अश्कों से-
टूटे हुए इस दिल की बरसात भरती हूँ।
-लक्ष्मी सिंह

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