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फूँक से सूरज बुझाना छोड़ दो

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

November 28, 2016

फूँक से सूरज बुझाना छोड़ दो
रेत की मुट्ठी बनाना छोड़ दो

हो नहीं सकता जहाँ दिल से मिलना
हाथ ऐसों से मिलाना छोड़ दो

बाग़ में अपने रहो कोयल बन के
ग़ैर की तुम धुन में गाना छोड़ दो

जान जाओ जिंदगी की गहराई
बाप की दौलत उड़ाना छोड़ दो

आँख रोती हो किसी की बारिश सी
यूँ किसी को तुम सताना छोड़ दो

होंठ सिल दे ग़म कभी हावी होकर
ये न हो के मुस्कुराना छोड़ दो

ख़्वाब में भी भूल जाना’सरु’ उसको
और आगे दिल लगाना छोड़ दो

सुरेश सांगवान ‘सरु’

Author
suresh sangwan
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