कविता · Reading time: 1 minute

फुटपाथों का बचपन

आँखों में अगणित प्रश्न लिए और मन में बस जिज्ञासा
तन से कोमल मन से कुंठित लगता है डरा डरा सा
बचपन में मानो जान लिया हो सारा जीवन दर्शन
ये फुटपाथों का बचपन है, ये फुटपाथों का बचपन

इन सूनी आँखों में, आशा के दीप नहीं जलते हैं
जीवन की सभी उमंगों को, ये पाँवों तले कुचलते हैं
चेहरे पर मासूम उदासी, अन्तर में लिए चुभन
ये फुटपाथों का बचपन है, ये फुटपाथों का बचपन

ऊपर है आकाश नग्न, नीचे कठोर धरती है
और जिन्दगी बनी विदूषक, नाच नचाती फिरती है
जैसे विषधर की फुंकारों के बीच फँसा चंदन
ये फुटपाथों का बचपन है, ये फुटपाथों का बचपन.

कितनी ही प्रतिभाएं हैं जो अन्जानी रह जाती हैं
राष्ट्रनिधि हो सकती थीं, पर राख बीनती फिरती हैं
इन्हीं चीथड़ों में लिपटे, आ जाएगा यौवन
ये फुटपाथों का बचपन है, ये फुटपाथों का बचपन.

श्रीकृष्ण शुक्ल, मुरादाबाद

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