फिर से बचपन आ जाता

गीत
जाने क्यों लगता है मुझको ?
फिर से बचपन आ जाता ।
खोई हुई ख़ुशी जीवन की
और प्यार मैं पा जाता ।

रोज़ बनाना नये घरौंदे
और मिटाना फिर उनको ।
बचपन की वह भोली सूरत,
अच्छी लगती थी सबको ।
उसे याद कर अब भी मेरा,
मन गुलाब-सा खिल जाता ।

किलकिल काँटे रोज़ खेलना
और अज़ब-सा कुछ गाना ।
रामायण की चौपाई- सा ,
सबके दिल पर छा जाना ।
बचपन वह निर्दोष रंग था ,
जो सबमें घुल-मिल जाता।

उठकर गिरना, गिरकर उठना,
हँसते-हँसते रो लेना ।
अम्मा की प्यारी गोदी में ,
मनभर के फिर सो लेना ।
दूध-मलाई-सा सुंदर वह ,
क्षण, सबका दिल बहलाता ।

आँखों में भोली चंचलता ,
मुँह में था बेवाकीपन ।
पैर दौड़ते रहते लेकिन ,
थकता नहीं कभी था तन ।
सब झंझट से मुक्त, मधुर
वह बचपन ख़ुशियाँ झलकाता ।

लँगड़ी, खो-खो ख़ूब खेलना,
फिर मित्रों से लड़ लेना ।
अगले दिन फिर उसे भूलकर,
पुनः दोस्ती कर लेना ।
वह पवित्रता, वह भोलापन,
काश ! मुझे फिर मिल जाता।

बेटे की हरक़तें देखकर,
बचपन बहुत याद आता है ।
उसकी नटखट लीलाओं में ,
मन मेरा खोता जाता है ।
इसीलिये उसके संग मैं भी,
छोटा बच्चा बन जाता ।

जाने क्यों ? लगता है मुझको,
फिर से बचपन आ जाता ।
खोई हुई ख़ुशी जीवन की
और प्यार मैं पा जाता ।
….रचनाकार —
ईश्वर दयाल गोस्वामी ।
ग्राम- छिरारी (रहली)
जि.- सागर (म.प्र.)

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