कविता · Reading time: 1 minute

— फिर भी नाज —

हड्डी का पुतला
खुद पर करता बड़ा नाज है
न जाने किस भ्रम में डूबा
बेसुर बजता यह साज !!

लिए फिरता है राख संग
न जाने कब माटी बन जाए
फिर भी घमंड का
सर पर रखता ताज !!

कुछ कहते ही आग बबूला
बन जाए यह इंसान
किस काम का तेरा यह तन
जो काम न आया आज !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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शिक्षा : एम्.ए (राजनीति शास्त्र), दवा कंपनी में एकाउंट्स मेनेजर, कविता, शायरी, गायन, चित्रकारी की रूचि है , Books: तीन कविता साहित्यापेडिया में प्रकाशित हुई है..यही मेरा सौभाग्य रहा है…
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