मुक्तक

तन भी सूखा मन भी सूखा,
फिर नेह कलश छलकाओ प्रिय ।
दहक रही हूँ विरह ताप में,
अब और नहीं दहकाओ प्रिय ।
बीत गये हैं कई बरस अब,
किये हुए आलिंगन तुमको-
झड़ी लगा कर सिंचित कर दो,
दामन मेरा महकाओ प्रिय।
-लक्ष्मी सिंह

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