मुक्तक · Reading time: 1 minute

# रुबाइयाँ//तालाबंदी

#रुबाइयाँ// तालाबंदी

लाठीचार्ज़ कहीं स्प्रे मिलता , मौत कहीं मज़दूरों को।
रोटी मंज़िल आराम नहीं , देख ज़रा तक़दीरों को।
दर-दर की ठोकर खाते हैं , भूखे प्यासे थक सोते;
खुद को इनमें देखो सोचो , याद करो लाचारों को।

जो लाए हैं कोरोना को , आए लोग ज़हाज़ों पर।
मज़दूर मगर ना पहुँचे हैं , घर सूने दरवाज़ों पर।
पहले इनको ही पहुँचाते , फिर तालाबंदी होती;
‘प्रीतम’ भूल बड़ी ये दिखती , हैरानी अंदाज़ों पर।

#आर.एस.’प्रीतम’
सर्वाधिकार सुरक्षित रचना

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