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….फिर चले आओ पिता………

Dayal yogi

Dayal yogi

गज़ल/गीतिका

April 18, 2017

रात फिर काली है आज
भय भगा जाओ पिता
छाती पर अपनी लिटाकर
फिर सुला जाओ पिता

देख लो मै इन अँधेरों से
अकेला लड़ रहा हूँ
आपकी दिखलाई राहों
पर निरन्तर बढ़ रहा हूँ

फिर क्युँ विचलित मन हुआ है
आओ समझाओ पिता

लाखों की है भीड़ पर
तुम बिन मैं तन्हा हूँ बहुत
थामने दो अँगुली अपनी
भटका भटका हूँ बहुत

या फिर मेरा हाथ पकड़ कर
मंजिल तक पहुँचाओ पिता

अब कहाँ से लाँऊ वो
जादू के जैसा बूढ़ा हाथ
हर चिन्ता को हरने वाला
हर दौलत से महँगा हाथ

मौत को जीवन बना दो
फिर चले आओ पिता

छाती पर अपनी लिटाकर
फिर सुला जाओ पिता

Author
Dayal yogi
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