गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

फासले बढते गये

फासले बढ़ते गये, ऐसा कभी सोचा न था।
साथ था वो मेरे, लेकिन मेरा अपना न था।

रूसवाईयां तो बहुत दी ,तेरे इश्क ने मुझे
ये दिल की लगी थी ,तभी कोई गिला न था।

बहुत आसान था, तेरे लिए भुलाना मुझको
मेरे लिए ये मगर,इतना कभी आसां न था।

टुकड़े टुकड़े हो गये खुद को तराशते हम
बन पाता किसी का खुदा, मैं ऐसा पत्थर न था।

लौट कर न आयेंगे,न उम्मीद कोई रखना तू
पहुंच पाए तुम तक,ऐसा कोई निशां न था।
सुरिंदर कौर

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