फागुन पर यौवन छाया

चली सुहानी पवन बसंती, गाती हुई फाग का राग
फागुन पर यौवन छाया, अंतर्मन में जला चिराग
प्रेम प्रीत की चलीं फुहारें, गीत हो गए राग विराग
पीली लाल चुनरिया ओढ़े, धरती खेल रही है फाग
पूर्णचंद्र मिलने को आतुर, छेड़ रहा है प्रेम का राग
मस्ती में है पलाश केसरिया, लगी हुई है वन में आग
अंमबा वौराया बागों में, नाच रहा हो जैंसे नाग
सप्त स्वरों में सृष्टि नाचे, सप्तरंग से सजी है फाग

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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