.
Skip to content

फाइव-पी समवन

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

कविता

February 13, 2017

फाइव-पी एक नमूना प्रति हैं. बड़े-बड़े प्रकाशक जो कुछ भी छापते हैं, उसमें से कुछ प्रतियां नमूने के निकालकर नि:शुल्का लुटाते हैं. इसके पीछे उनकी दूरदर्शिता होती है. मछली पकड़ने का यह जाल होता है. इसी प्रकार मुकुन्दी मास्साब फाइव-पी के नमूना प्रति हैं, जिनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संतुलित विश्लेंषण या यूँ कहें मीमांसा से हमारे विद्या मन्दिरों, जिन्हें हम स्कूल, विद्यालय, कॉलेज या विश्वविद्यालय भी कह सकते हैं, की मोनालिसा जैसी तस्वीर पेश हो सकती है.

मुकुन्दी मास्साब जब स्कूल पधारते हैं, तो समाज पर अति कृपा होती है. कारण, वह कम ही पधारते हैं. आज फिर से मुकुन्दी मास्साब पधारे हैं. इनको अपने आस-पास देखकर विद्या मन्दिर की दीवारें मुस्करा दी हैं. बरामदे में लटकी पीतल की पुरानी गोल घंटी स्वयं बजने को आतूर है. बेतरतीब लगे फूल-पौधे कतारबद्ध होने के लिए मचल रहे हैं. खाली पड़ी स्टॉैफ रूम की कुर्सियॉं अपने भाग्य पर इतराने को व्याकुल हो रही हैं. कबाड़ का रूप ले चुका पुस्तकालय मचल गया है. कभी श्या्मपट्ट तक न पहुँचे नए किन्तु पुराने हो रहे डस्टर के श्यामपट्ट तक न पहुँचने की आशा एक बार पुन: जग गई है और यह सब केवल मुकुन्दी् मास्सा्ब के पधारने पर हो रहा है.
मुकुन्दी मास्साब विद्या मन्दिर पहुँच गए हैं. पहला ‘पी’ साकार होने वाला है. मुकुन्दी‍ मास्साब ने विद्या मन्दिर में पधारकर पानी पी ली है. धन्य भाग्य चटकी सुराही के. फाइव-पी का बीस प्रतिशत कार्य मुकुन्दी मास्साब के सुराही से लेकर पानी पीने के साथ ही पूर्ण हो गया. अगले पड़ाव अर्थात् दूसरे ‘पी’ की ओर बढ़ते हैं. दूसरा पड़ाव पवित्र नगरी वाराणसी की सैर के बराबर है. पानी पीने के बाद मुकुन्दी मास्सााब को बनारसी पान का स्मरण हो रहा है. मुकुन्दी मास्साब ऑंख बन्द कर लिए हैं और बनारसी पान की कल्पना करते हुए चौरसिया की दुकान का पान अपने मुँह में डाल रहे हैं. खई के पान बनारस वाला के स्वर उनके मुँह से निकलने ही वाले हैं, पर वह गुनगुना कर रह जाते हैं. यह लीजिए दूसरा ‘पी’ भी साकार हुआ. मास्साब ने पान खा ली.
मुकुन्दी मास्साब को प्रकृति से घोर शिकायत है. मास्साब का ब्लड शूगर बढ़ा रहता है, ब्लड प्रेशर हाई प्रोफाइल हो चुका है. मास्साब के शरीर ने अपना आवश्यक/अनावश्यक विस्तार ले लिया है. मोटापे के साथ पान का विशेष सम्बन्ध है. ज्ञानी लोग कहते हैं, मोटे लोग जब पान खाते हैं और उसमें ज़र्दा, जिसे विभिन्न. नम्बरों यथा- चौंसठ, छप्पन, पचास, तीन सौ आदि से जाना जाता है, पड़ा होता है, तो पसीने का आना तय होता है. निश्चिय ही टू-पी के बाद मुकुन्दी मास्साब पसीने से तर हैं और अपने कुर्ते, जो नब्बे प्रतिशत पसीने से तर हो चुका है, से अथक प्रयास से पसीने को पोछ रहे हैं. यह दृश्य अत्येन्त ही मनोहारी है. कुर्ते में इस क्रिया से पीकें लग चुकी हैं. आधुनिक फाइन आर्ट का सच कुर्ते में समा चुका है और इस प्रकार तीसरा-पी भी घटित हो चुका है. मुकुन्दी मास्साब पसीना पोछ चुके हैं. चतुर्थ-पी लम्बा चलने वाला है. मुकुन्दी मास्साब ट्रिपल-पी अर्थात् पब्लिक, प्राइवेट, पार्टनरशिप को अंजाम देने के पश्चा्त मिमियाती कुर्सी पर बैठ चुके हैं. यह कुर्सी मुकुन्दी मास्साब के अल्पभार को सहते-सहते चों-चों करने लगी है. कुर्सी की चुलें ढीली पड़ चुकी हैं, पर मुकुन्दी कब्र में लटकी इस कुर्सी पर आराम से बैठकर पैर हिला रहे हैं. यह चौथा पी है. यह क्रिया लम्बी चलने के बाद विद्या मंदिर का समय ‘ओवर’ हो चुका है. नव साक्षर होने को आतूर राष्ट्र की ऊर्जा पलायित हो चुकी है. इसी के साथ मुकुन्दी मास्साब की पैर हिलाई भी विराम की ओर अग्रसर है. बस, पैर हिल चुका है और चौथा ‘पी’ घटित. मुस्कराने को आतूर विद्या मन्दिर की दीवारें मुस्करा भी नहीं पाईं. लटकी हुई पुरानी पीतल की घंटी स्वयं नहीं बज पायी. किसी शैतान लड़के ने बेहया की छड़ी से एक-दो मिनट पहले हो ठोक दिया. बेतरतीब लगे फूल-पौधे नहीं सज पाए. समय से पहले ही मुरझा गए. स्टॉफ रूम की कुर्सियां फिर अपने भाग्य पर रोने लगीं. पुस्तकालय की पुस्तकों पर धूल की एक परत और चढ़ गई. बस, अगले ‘पी’ का घटित होना शेष बचा रहा. चार पी के घटित होने के बाद पॉंचवे ‘पी’ को घटित होना तय है. इसे कोई नहीं रोक सकता. मुकुन्दी मास्साब भी इसे रोक नहीं सकते. उच्च मधुयुक्त काया इसे रोकने में पूर्णतया असमर्थ है. अस्तु, पॉंचवॉं ‘पी’ भी घटित हो गया. मास्साब विद्या मन्दिर के दुर्गन्धी वातावरण वाले शौचगृह में पधार चुके हैं. मुकुन्दी मास्साब के पेशाब करने की अन्तिम क्रिया अर्थात् मूत्र विसर्जन के साथ ‘फाइव पी’ साकार हो चुका है. यह फाइव-पी पानी, पान, पसीने पैर व पेशाब का अद्वितीय समन्वय है. फाइव पी के साकार होने के बाद मुकुन्दी मास्साब विद्या मन्दिर से जा चुके हैं. नालन्दा और तक्षशिला जैसे विद्या मन्दिरों के देश की शैक्षिक स्थिति का नमूना प्रति वितरित हो चुका है. मुकुन्दी मास्साब के ऐसे समय में पधारने की विद्या मन्दिर को प्रतीक्षा है, जब फाइव-पी घटित न हो.

Author
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर' काव्य संग्रह मित्र प्रकाशन, कोलकाता के सहयोग से प्रकाशित। सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन, दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन, वेस्ट बंगाल : एट ए ग्लांस जैसी... Read more
Recommended Posts
* गुस्ताख़ ये दर्द *
गुस्ताख़ ये दर्द अब हमें जीने नहीं देगा पी-पी के हारे ज़ाम अब पीने नहीं देगा रात की तन्हाई हो या दिन का सूनापन पी-पी... Read more
गीतिका/ग़ज़ल
मापनी- २,२,२,२,२,२,२,२, पदांत- किया जाता है , समान्त- आन “गीतिका- गज़ल” प्रति दिन दान किया जाता है मान गुमान किया जाता है जिंदगी चलती नेक... Read more
प्रेम हाला....
** प्रेम - हाला ** ---------------------------- पी ली मैंने पी की प्रेम-हाला मन आनंद मदमस्त मधुशाला बन पिय की हृदय रानी गुलाबी-सा खुमार जानी छाया... Read more
थोड़ा इश्क़
तुम समय काटने के लिए, इश्क़ का सहारा लेते हो! ग़ालिब की ग़ज़ले सुनकर बड़े हुएं, और अब ग़ालिब से बड़ा होना चाहते हो! तुमने... Read more