फ़र्क (लघुकथा)

फ़र्क-
मेधा को अपने मायके से आए हुए अभी एक घंटा ही हुआ था कि फोन की घंटी बजी।मेधा ने फोन उठाया-हैलो, कौन?उधर से आवाज़ आई,बहू मैं आपकी सास की सहेली राधा आंटी बोल रही हूँ।
मेधा – नमस्ते आंटी, और आप कैसी हैं?
राधा- मैं बिल्कुल ठीक हूँ,पर तुम्हारी सास की तबियत ठीक नहीं है।सुबह ही उन्हें अस्पताल में एडमिट कराया गया है।सोचा तुम्हें बता दूँ। तुम्हारी सास तुम दोनों को और अपने पोते को बहुत याद कर रही हैं।
मेधा- धन्यवाद आंटी।बहुत अच्छा किया जो आपने बता दिया।मैं माँ जी से मिलने अवश्य आऊँगी।आखिर उनका हम लोगों के अलावा है ही कौन।
राधा- ठीक है बहू।मैं तुम्हारी सास को बता देती हूँ।
शाम को चार बजे मेधा अपने पति और बेटे के साथ अस्पताल अपनी सास से मिलने पहुँची।अस्पताल में उसे राधा आंटी भी मिली।राधा- बहुत अच्छा किया बहू जो तू आ गई।तुम लोगों को बहुत याद कर रही थीं। लगभग एक घंटा अस्पताल में रुकने के बाद मेधा ने कहा, अच्छा आंटी , अब चलती हूँ। बहुत थकी हुई हूँ। आज सुबह ही मम्मी के घर से आई थी।उनकी भी तबियत बहुत खराब थी,इसलिए एक सप्ताह वहाँ लग गया।भाई तो अमरीका में सर्विस करता है । वह तो आ नहीं सकता था।मुझे ही उनकी देखभाल करनी थी ।पर माँ जी की तबियत खराब होने का समाचार आपने दिया तो अपने आपको रोक नहीं पाई।थकी होने के बावजूद आ गई।सोचा , लोग कहेंगे कि अपनी मम्मी की तबियत खराब थी तो एक हफ्ता रुक कर आई लेकिन सास को देखने भी नहीं गई।
राधा ने सुना स्तब्ध रह गई और बोलीं- बहू समय मिले तो फिर देखने आ जाना।ज़िन्दगी का क्या भरोसा?

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