मारे ऊँची धाँक,कहे मैं पंडित ऊँँचा

ऊँचा मुँह कर बोलते, गुटखा खा श्रीमान|
गाल छिले, फिर भी फँसे, बहुत बुरा अभिमान ||
बहुत बुरा अभिमान ज्ञान की त्यागी बातें|
निज मन के बस हुए,खा रहे दुख की लातें||
कह “नायक” कविराय विश्व के कर में कूँचा|
मारे ऊँची धाँक, कहे मै पंडित ऊँँचा||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

गुटखा= कटी सुपारी,कत्था,तम्बाकू एवं चूना का मिश्रण जो पैक किया हुआ बाजार में मिलता है|,
(एक नशीला मिश्रण)

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