मारे ऊँची धाँक,कहे मैं पंडित ऊँँचा

ऊँचा मुँह कर बोलते, गुटखा खा श्रीमान|
गाल छिले, फिर भी फँसे, बहुत बुरा अभिमान ||
बहुत बुरा अभिमान ज्ञान की त्यागी बातें|
निज मन के बस हुए,खा रहे दुख की लातें||
कह “नायक” कविराय विश्व के कर में कूँचा|
मारे ऊँची धाँक, कहे मै पंडित ऊँँचा||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

गुटखा= कटी सुपारी,कत्था,तम्बाकू एवं चूना का मिश्रण जो पैक किया हुआ बाजार में मिलता है|,
(एक नशीला मिश्रण)

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 104

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share