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प्लास्टिक की गुडिया

रजनी मलिक

रजनी मलिक

लघु कथा

January 5, 2017

“सुरभि चलो!जल्दी से तैयार हो जाओ!आज हमें गुप्ता जी के यहाँ पार्टी में जाना है,और प्लीज अच्छी सी साड़ी डालना कोई।”सुरभि ये सुनते ही हैरान हो गई,”प्रणय तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया,आज पूरा दिन मुझे सरदर्द था,मेरी कोई भी साड़ी प्रेस नहीं है।”तुम पहले बता देते !तो अच्छा होता।”प्रणय ने अजनबी की तरह तुरंत कहा-“इसमें बताने जैसा क्या है,अब कह रहा हूँ ,जल्दी तैयार हो जाओ।”
सुरभि ने जल्दी जल्दी अलमारी खोली ।सब कपडे निकाले और तैयार हो गयी। अभय और आनंदी को जल्दी जल्दी कपडे पहनाये। प्रणय भी बीच बीच में आवाज़े लगाता रहा। पार्टी के बाद देर रात थककर फिर सभी घर लौटे। फिर अगले दिन प्रणय ऑफिस चला गया। सुरभि बच्चों को तैयार करके स्कूल छोड़ आई। अपनी दिनचर्या ख़त्म करके लेटी ही थी की प्रणय का फ़ोन आया।”सुरभि शाम को मेरे कुछ ऑफिस के साथी चाय पर आ रहे है। उनके लिए स्नैक्स और चाय रेडी रखना ।”लेकिन प्रणय शाम को मुझे स्टिचिंग सेंटर जाना होता है,”सुरभि ने कहा!”तो आज मत जाना।”प्रणय ने तिलमिलाते हुए कहा।”लेकिन*और प्रणय ने फ़ोन काट दिया। सुरभि अपनी बात पूरी भी न कह सकी।
सुरभि ने फ्रिज खोला देखा धनिया ,मिर्ची कुछ नहीं था। दौड़कर मार्किट गयी ।सब सामान लेकर आई।
शाम को प्रणय समय पर अपने दोस्तों के साथ घर आ गया। बच्चे भी स्कूल से आ गए थे ।तो उनको जल्दी खाना खिलाकर पढने बैठाया। प्रणय
काफी देर तक अपने दोस्तों के साथ बाते करता रहा। फिर सुरभि रात के खाने की तैयारी में लग गई। रात को सबने साथ खाना खाया।
फिर प्रणय ने कॉफी के लिए सुरभि को आवाज़ लगाई। सुरभि बच्चों को सुलाकर कोफी लेकर बालकनी में आई। सुरभि के चेहरे पे थकान साफ़ नज़र आ रही थी।कोफी हाथ में पकड़ते ही प्रणय बोला'””मेरे ऑफिस में एक नया बंदा आया है पवन। यही चौक के आगे किराये पर रहता है। उसका बेटा पढाई में बहुत वीक है। वो मुझे बता रहा था। तुम तो हर समय घर पर रहती हो,मैंने उसे बोल दिया है कि वो उसे दोपहर में 3 बजे घर भेज दे ,तुम उसे कुछ दिन पढ़ा देना।”अचानक सुरभि के सब्र का बाँध टूट गया ,जिसे उसने बरसों से रोक रखा था,आज उसकी मन की थकान उसके देह की लक्ष्मण रेखा को लाँघ कर बाहर आ गयी….और उसने तीखी आवाज़ में प्रणय से कहा”प्रणय तुमने कभी मुझसे पूछा की मै क्या करना चाहती हूँ,हर बार तुम अपने शब्दों को मुझ पर लाद देते हो,तुम्हें मेरी नहीं ,एक प्लास्टिक की गुडिया की जरुरत है, जो वैसे ही रहे जैसा तुम चाहो।”प्रणय खामोश था और सुरभि अपने वजूद को पहचान दे रही थी।
#रजनी

Author
रजनी मलिक
योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"
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