Dec 6, 2020 · कविता
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प्रेयसी

हो रही क्यों उदास उदासी,
पट खोल दे आगत् को,
आ रहा बटोही महल हृदय में,
सामान सजाले स्वागत् को ।

पुर्ण विधु की सी तुम द्युति
भरती दीप्ति विकट अंधेरों में.
मावस सी हुई हो, नहीं ज्ञात तुम्हें ?
कितने चकोर कूद पङेंगे झेरों में ?

वल्लरी सी संरचना तुम्हारी
हिम सरीखी काया है
सरित सरोवर पुष्प पठार
तुझमें दिखती सबकी छाया है ।

सौंदर्य की विरल प्रतिमा हो
आरसी भी तुमसे शर्माया है
अथाह प्रेम के भाव हृद्य में
तुमने रच कविता दर्शाया है ।

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Devender Kumar Dahiya
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