गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

प्रेम

प्रेम में प्रकृति से यूँ मुहँ मत मोड़ो
चाँद,सूरज को बख्शो,तारे मत तोड़ो ।
बादलों को भी रहने दो अपनी जगह
उन्हें हुस्न के ज़ुल्फ़ों से मत जोड़ो ।
फूल,कलियाँ, हैं बागों की अमानत
बहारों से सबका रिश्ता मत तोड़ो।
बिजली, बारिश, सावन की घटा को
कृपा करके अपने हाल पर छोड़ो ।
प्रेम में प्रकृति ने लुटा दिया खुद को
या खुदा! उसे अब और मत तोड़ो ।
प्रेम में सिर्फ़ सेवा और त्याग चाहिए
जिस्म के लिए रूह तो मत तोड़ो ।
बस बहुत हो गया अजय बकबक
खामखाह अपना सर मत फोड़ो।
-अजय प्रसाद

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