Feb 2, 2021 · कविता

प्रेम रिश्ते का आधार

प्रेम अपरिमित असीमित अपरिभाषित
अनंत जिसका विस्तार है।
शब्दों से न तौल सके जिसको
अनंत संभावनाओं का आधार है।
नही बाँध सकते इसे किसी रिश्ते में
हर रिश्ते में जुड़ा यह
हर रिश्तों का ही सार है।
जीव जगत की कल्पना में प्रेम ही तो
एक शाश्वत सार है।
प्रेम की पराकाष्ठा उस माँ से पूछिए,
गर्भ में पड़ते भ्रूण ही
उमड़ उठता अनदेखा अनकहा प्यार है।
प्रेम की संभावना उस पिता से पूछिए
जो अपने संतान की सुख के लिए
बहाता पसीना दिन रात है।
प्रेम इस जगत में जीवन का ही सार है।
प्रेम की पराकाष्ठा उस भाई बहन से पूछिए,
लड़ने झगड़ने के बाद भी जिनका एक दूसरे के लिए परवाह फिक्र और ख्याल है।
प्रेम का विस्तार उस मित्र के साथ अनमोल है,
जो बिना किसी रिश्ते के भी दे रहे हर सुख दुख में साथ हैं।
आपकी खुशी में खुश और दुख में दुखी होने का जिंनके पास भी एहसास है।
प्रेम उस प्रेमी के लिए जिन्हें न कभी मिलन की आस है,
फिर भी दिल में अनोखा जुड़ाव है
प्रेम पति पत्नी का जगत का सम्पूर्ण सार है।
जहाँ तन मन दोनों ही समर्पण के बाद भी एक सुखद एहसास है।
हर रिश्ते में प्रेम ही है तो वह खास है,
बिना प्रेम के किसी रिश्ते की क्या बिसात है।

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