प्रेम बनो,तब राष्ट्र, हर्षमय सद् फुलवारी||

फुलवारी में फूलते, बहु रंगों के फूल|
पवन चली,चुंबन सहित,बने प्रीतिमय चूल||
बने प्रीतिमय चूल ,सदा हँसते-इठलाते|
हिल-मिलकर सद्भाव, नेह का पाठ पढ़ाते||
कह “नायक” कविराय, ज्ञान गह,द्वंद मदारी
प्रेम बनो,तब राष्ट्र, हर्षमय सद् फुलवारी||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

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